Poetry

पापा मैं छोटी से बड़ी हो गयी क्यों

Papa mein choti se badi ho gayi kyun

कल ही तो सीखा था आपके आँगन मैं चलना मैंने,
अभी कल ही तो सीखा था बोलना मैंने,
जब आपजे हांथों मैं छुप जाते थे मेरे छोटे से दोनों हाँथ।

आज जा रहीं हूँ एक नए आँगन को सजाने,
आज अपने हांथों की मेहँदी से,
जा रहीं हूँ एक नए घर को महकाने।
आज लगता है समय बीत गया इतनी जल्दी क्यों?
पापा मैं छोटी से नदी हो गयी क्यों?

होती थी मेरे दिन की सुबह ही जब माँ से,
करते शैतानी गुजरता था दिन,
जब रात का मतलब होता था सुनना परियों की कहानी बाबा-दादी से,
जब सीमित थी मेरी दुनिया गुड्डे, गुड़ियों में बस।

आज उनकी परी को भी लेजा रहा है एक राजकुमार,
अब जा रही हूँ बसाने अपनी दुनिया नयी,
जहाँ सुबह का मतलब अब होगा एक नया दिन।

पर आपके लिए हमेशा मैं आपकी छोटी सी परी ही हूँ,
बस सोचती हूँ, कुछ दिन और रह जाती मैं आपजे पास।

मुझे भेजने की इतनी जल्दी थी क्यों?
पापा मैं छोटी से बड़ी हो गयी क्यों?

     

 

Author: rashi mital

A mother and a travel enthusiast, I love speed and am proud of my driving skills. In my free time I love reading, writing, and sometimes doing nothing. I try to live every moment and believe in living young despite the age.

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