Poetry

एक ख़्वाब…

a dream

नहीं जानती थी क्या और कौन थे तुम!
पर जाना तुम्हे और कुछ कुछ प्यार को!
जगा दिए तुमने वो जज़्बात, वो प्यार, जो दबा था मेरे दिल में कहीं!
नहीं चाहती थी जिन जज़्बातों को मैं सरहद पे लाना,
उन जज़्बातों का शहर बसा दिया तुमने…

उन रातों में ना जानें कितनी बात करली तुमसे, और मान बैठी उस सपने को, जो तुमने दिखाया था, हकीकत…

वो ख्वाब, जो मेरी आँखों ने कभी देखा ही नहीं, क्यूंकि वो तो किसी और का था,
जो जा रहा था,
किसी और को ख्वाब देने,
उड़ते उड़ते भटक गया मेरे जज़्बातों के उसी शहर में,
जो बसाया था तुमने…

मिट्टी के उस शहर में ढ़ूढ़्ने लगी थी अपना घर कहीं, पर जानती नहीं थी मैं,
की इस बेरंग शहर में तो,
कोई बसता ही नहीं!

कोई बसे भी कैसे वहां…
बनाया था तुमने समुन्दर के किनारे पे जो उसे!

हाँ, मानती हूँ की देखने में इससे सुन्दर द्रिश्य ना मिलेगा मुझे और कहीं…
लेकिन जेहन में कहीं ना कहीं यह भी जानती थी,
की एक दिन इसी समुन्दर की लहरें, समेट लेंगी मेरे इस शहर को अपने आँचल में…

फिर भी, चाहते थे तुम की बसाऊँ मैं अपनी दुनिया यहीं…
और में पागल सी, चल पड़ी बसाने वहीँ अपनी दुनिया नयी…

समय भी जैसे साथ था तुम्हारे, जो इंद्रधनुष को भी देर ना लगी आने में…
और भर दिए हमारे शहर में उसने रंग कई…
हाँ, अब तो वो हमारा ही था…

अच्छा लगता था बैठना तुम्हारे साथ, समुन्दर के किनारे हमारे घर के आँगन में…
देखना ढलते सूरज को, वापस जाती समुन्दर की लहरों को, और शाम में घर लौटते परिंदों को…

यही तो कारीगरी थी तुम्हारी और उस ख्वाब की…
जिसने मुझे भुला दिया की ये सब कुछ मेरा कभी था ही नहीं!

ये तो बसाया था उस उड़ते हुए, भटके हुए ख्वाब ने,
जो कुछ देर रुक गया था मेरी आँखों की गलियों में जैसे…
जिसे याद आ गयी उन नज़रों की, जो कर रही थी उसका इंतज़ार…

उड़ा जो वो ख्वाब, साथ उड़ा ले गया तुम्हे भी!
अपनी नज़रों के सामने उड़ते हुए देखा, तुम्हे उस ख्वाब के साथ,
और तुम्हे रोक भी ना सकी,
रोकती भी कैसे, किस हक़ से, तुम्हारे लिए तो शायद मैं सिर्फ एक पलछिन थी!

पर जाते हुए कह गए तुम,
ये शहर, वो परिंदों के घोंसले, ये लहरें और ये किनारे का सवेरा, सब था मेरा!

शायद जानती थी दिल में कहीं, एक दिन तो ये होना ही था!
पर मलाल इस बात का रहेगा,
जाते हुए तुमने एक बार मेरी बात सुनना भी ज़रूरी नहीं समझा…

कहना चाहती थी तुमसे…

ये शहर, ये किनारा, ये परिंदों के घोंसले… सब तो बसाये थे तुमने!
जब तुम ही नहीं तो ये सब ‘अब’ ज़रूर बन गए हैं मेरे लिए “एक ख्वाब“…
वही ख्वाब, जो मैं कभी देखना ही नहीं चाहती थी…

पर लगता है… बस गया है मेरी आँखों में ये हमेशा के लिए…

क्यूंकि… दिख जाता है मुझे दिन के उजाले में भी ये कभी कभी…

 

I am taking my Alexa rank to the next level with Blogchatter and #MyFriendAlexa.

My current Alexa rank is 33 million.

Author: rashi mital

A mother and a travel enthusiast, I love speed and am proud of my driving skills. In my free time I love reading, writing, and sometimes doing nothing. I try to live every moment and believe in living young despite the age.

8 Comments on “एक ख़्वाब…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *